
चित्त की 5 अवस्थाएं। Yogsutraa.in चित्...

चित्त की 5 अवस्थाएं। Yogsutraa.in चित्त= मन, बुद्धि और अहंकार के समन्वय को कहते हैं। इसी को अंतःकरण भी कहते हैं। वैदिक मंत्रों में भी चित्त की असीम शक्तियों का वर्णन किया गया है। वैदिक मंत्रों में चित्त बलशाली और आत्म विश्वासी बनाने की कामना की गई। हमारा चित्त त्रिगुणात्मक अर्थात सत्व( प्रकाशशील), रज( क्रियाशील)और तमोगुण(जड़ता) स्वभाव वाला होने से त्रिगुणात्मक है। चित्त को जैसा भी वातावरण मिलता है चित्त भी वैसा ही हो जाता है। 1.क्षिप्त= चित्त की क्षिप्त अवस्था में रजोगुण प्रधान होता है। इस अवस्था में मन अत्यंत अस्थिर और चँचल होता है। चित्त किसी एक विषय पर स्थिर नहीं हो पाता, चित्त इधर से उधर भटकता रहता है। इस अवस्था में योग संभव नहीं है। 2. मूढ= चित्त की मूढ अवस्था में तमोगुण की प्रधानता रहती है। तमोगुण के कारण मन अत्यंत आलस्य में रहता है। तमोगुणी भोजन करना व आलस्य के कारण देर तक सोए रहना। हमेशा नींद में रहना। क्या करना है क्या नहीं करना समझ में नहीं आता। इस अवस्था में भी योग संभव नहीं है। 3. विक्षिप्त= विक्षिप्त अवस्था में सत्व गुण प्रभावशाली होता है। बीच-बीच में तमोगुण- रजोगुण घटते- बढ़ते रहते हैं, जैसे साधक ध्यान में बैठा 2 मिनट ध्यान लगा फिर ध्यान भटक गया। मन थोड़ी देर शांत है फ़िर कोई स्मृति याद आई मन फिर भटक गया। जब मन की शांति स्थिति बिगड़ती है उसी का नाम विक्षिप्त अवस्था है। इस अवस्था में योग का आरंभ होता है। 4. एकाग्र= चित्त की एकाग्र अवस्था में समाधि होती है। इस अवस्था में सत्व गुण प्रधान होता है। एकाग्र अवस्था में वस्तु के सत्य स्वरूप का बोध हो जाता है। इस अवस्था में पंच क्लेश अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष , अभिनिवेश क्षीण हो जाते हैं। जन्म- जन्मांतर के कर्म के बंधन ढीले पड़ जाते हैं। वह एकाग्र अवस्था संप्रज्ञात योग नाम से जानी जाती है। 5.= निरोध अवस्था= चित्त की निरोध अवस्था में चित्त त्रिगुणात्मक अवस्था से मुक्त हो जाता है। अर्थात चित्त सत्व गुण से भी मुक्त हो जाता है। चित्त की इसी अवस्था को असंप्रज्ञात योग भी कहा जाता है।
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